राजस्थान के उदयपुर में पैदा हुए उदय शंकर चौधरी मूलतः नरैल (वर्तमान
बांग्लादेश) के एक
बंगाली परिवार से संबंधित थे। उसके पिता एक प्रख्यात वकील श्याम शंकर चौधरी अपने सबसे बड़े पुत्र के जन्म से समय राजस्थान में
झालावाड़ के महाराजा के यहां कार्यरत थे जबकि उनकी मां हेमांगिनी देवी एक बंगाली जमींदारी परिवार की वंशज थीं। उनके पिता को नवाबों द्वारा "हरचौधरी" की उपाधि प्रदान की गयी थी लेकिन वे अपने उपनाम से "हर" को हटाकर सिर्फ 'चौधरी' का प्रयोग करना पसंद करते थे। उनके छोटे भाई राजेन्द्र शंकर, देबेन्द्र शंकर, भूपेन्द्र शंकर और 1926 में पैदा हुए
रवि शंकर थे जिनमें से भूपेंद्र की मौत 1926 में कम उम्र में ही हो गयी थी।
उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे जिन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी और बाद में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था जहां वे डॉक्टर ऑफ फिलोसफी बने थे। क्योंकि उनके पिता को अपने काम के संदर्भ में बहुत अधिक घूमना पड़ता था, इसलिए उनके परिवार ने ज्यादातर समय उदय के मामा के घर नसरतपुर में उनकी माँ और भाइयों के साथ बिताया था। उदय की पढ़ाई भी विभिन्न स्थानों पर हुई जिनमें नसरतपुर, गाज़ीपुर,
वाराणसी और झालावाड़ शामिल हैं। अपने गाज़ीपुर के स्कूल में उन्होंने अपने चित्रकला एवं शिल्पकला के शिक्षक अंबिका चरण मुखोपाध्याय से संगीत और फोटोग्राफी की शिक्षा प्राप्त की
1918 में अठारह वर्ष की आयु में उन्हें जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट और उसके बाद गंधर्व महाविद्यालय में प्रशिक्षण के लिए मुंबई भेजा गया था। तब तक श्याम शंकर ने झालावाड़ में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और
लंदन चले गए थे, यहाँ उन्होंने अंग्रेज महिला से शादी कर ली और एक शौकिया संयोजक (इम्प्रेसारियो) बनने से पहले कानून की प्रैक्टिस करने लगे, इस दौरान उन्होंने ब्रिटेन में भारतीय संगीत और नृत्य की शुरुआत की. बाद में उदय अपने पिता के साथ शामिल हो गए और 23 अगस्त 1920 को सर विलियम रोथेंस्टीन के अधीन चित्रकारी का अध्ययन करने के लिए लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने अपने पिता द्वारा लंदन में आयोजित करवाए गए कुछ चैरिटी कार्यक्रमों में नृत्य का प्रदर्शन किया, ऐसे ही एक अवसर पर प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा भी मौजूद थीं, यह उनके करियर में दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाली घटना बनी.
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उदय शंकर और अन्ना पावलोवा 1923 के प्रसिद्ध नृत्य-नाट्य 'राधा कृष्ण' में.
उदय शंकर ने
भारतीय शास्त्रीय नृत्य के किसी भी स्वरूप में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, उनकी प्रस्तुतियां रचनात्मक थीं। हालांकि कम उम्र से ही वे भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियों के संपर्क में आते रहे थे, यूरोप में रहने के दौरान वे बैले से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दोनों शैलियों के तत्वों को मिलाकर नृत्य की एक नयी शैली की रचना करने का फैसला कर लिया जिसे हाई-डांस (hi-dance) कहा गया। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के स्वरूपों और उनके प्रतीकों को नृत्य रूप प्रदान किया; इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश संग्रहालय में राजपूत चित्रकला और मुगल चित्रकला की शैलियों का अध्ययन किया था। इसके अलावा ब्रिटेन में अपने प्रवास के दौरान वे नृत्य प्रदर्शन करने वाले कई कलाकारों के संपर्क में आये, बाद में वे फ्रांसीसी सरकार के वजीफे 'प्रिक्स डी रोम' पर कला में उच्च-स्तरीय अध्ययन के लिए रोम चले गए।
शीघ्र ही इस तरह के कलाकारों के साथ उनका संपर्क बढ़ गया, साथ ही भारतीय नृत्य करने को एक समकालीन रूप देने का उनका विचार भी मजबूत हुआ। उनकी कामयाबी के रास्ते में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा से एक मुलाक़ात के रूप में आया। वे भारत आधारित विषयों पर सहयोग के लिए कलाकारों की खोज में थीं। इसी के कारण हिन्दू विषयों पर आधारित बैले की रचना हुई जिसमें अन्ना के साथ एक युगल '
राधा-कृष्णा' और 'हिंदू विवाह' को अन्ना के प्रोडक्शन 'ओरिएंटल इम्प्रेशंस' में शामिल किया गया था। इस बैले का प्रदर्शन लंदन के
कोवेंट गार्डन में स्थित रॉयल ओपेरा हाउस में किया गया था। बाद में भी वे बैले की रचना और कोरियोग्राफी में जुटे रहे जिनमें से एक
अजन्ता गुफाओं के भित्तिचित्रों पर आधारित है, साथ ही उन्होंने अन्ना के साथ संपूर्ण संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रदर्शन किया, इस दौरान उनकी नृत्य शैली को उन दिनों "हाई डांस" के रूप में जाना गया, हालांकि बाद में उन्होंने इसे "क्रिएटिव डांस (रचनात्मक नृत्य)" कहा.
पेरिस में अपने बूते पर काम शुरू करने से पहले उन्होंने अन्ना के साथ डेढ़ वर्ष तक काम किया।
'उदय शंकर नृत्य-नाट्य ट्रूप' ई. (1935-1937).
शंकर, एक फ्रेंच पियानोवादक साइमन बार्बियरे जो अब उनके शिष्य और डांस पार्टनर बन गए थे और एक स्विस संगतराश
nl:Alice Boners, एलिस बोन्नर जो भारतीय कला के इतिहास का अध्ययन करना चाहते थे, को साथ लेकर 1927 में भारत लौटे. उनका स्वागत स्वयं
रवींद्रनाथ टैगोर ने किया और भारत में प्रदर्शन कला का एक विद्यालय खोलने के लिए उन्हें राजी भी कर लिया।
1931 में पेरिस वापस लौटने पर उन्होंने अपने एक पुराने शिष्य स्विस संगतराश एलिस बोनर के साथ यूरोप की पहली भारतीय नृत्य कंपनी की स्थापना की. वहाँ संगीतकारों विष्णु दास शिराली और तिमिर बारान के साथ मिलकर उन्होंने अपनी नव विकसित नृत्य गतिविधियों को शामिल करने के लिए संगीत के एक नए टेम्पलेट की रचना की. नृत्य प्रदर्शन की उनकी पहली श्रृंखला 3 मार्च 1931 को पेरिस में चैम्प्स-एलिसीज थिएटर में आयोजित की गयी थी जो उनकी बुनियाद बनी क्योंकि उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा किया, साथ ही फ्रांसीसी नर्तकों और कोरियोग्राफरों के साथ अपने संपर्क का विस्तार किया।
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जल्द ही उन्होंने संयोजक सोल हुरोक और संयोजक आरोन रिचमोंड की सेलिब्रिटी सीरीज ऑफ बोस्टन के तत्वावधान में 'उदय शंकर एंड हिज हिंदू बैले' शीर्षक से अपनी मंडली के साथ पूरे पश्चिमी जगत - यूरोप और अमेरिका में सात-वर्षों का एक दौरा शुरू किया। उन्होंने अमेरिका में अपना पहला प्रदर्शन अपने डांस पार्टनर, एक फ्रेंच डांसर सिमकी के साथ जनवरी 1933 में न्यूयॉर्क में किया था; उसके बाद वे अपनी मंडली के साथ 84 शहरों के एक दौरे पर निकल गए।
भारतीय नृत्य में पश्चिमी नाट्य तकनीकों के उनके अनुकूलन ने उनकी कला को भारत और पश्चिमी जगत दोनों में बेहद लोकप्रिय बना दिया और उन्हें उचित रूप से पारंपरिक भारतीय मंदिर नृत्यों में
पुनर्जागरण के एक युग की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है, जिन्हें आज भी उनकी सख्त व्याख्याओं के लिए जाना जाता है और जो उनकी अपनी जिंदगी में भी पूरी तरह से व्याप्त था जबकि उनके बड़े भाई
रवि शंकर ने
भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम में लोकप्रिय बनाने में मदद की.
उदय शंकर और आमला शंकर द्वारा प्रदर्शित फिल्म कल्पना, 1948
1936 में उन्हें लियोनार्ड नाईट एल्महर्स्ट द्वारा उनकी मंडली और मुख्य डांसर सिमकी के साथ छः महीने के प्रवास के लिए डार्टिंगटन हॉल, टोटनेस, डोवन आने के लिए आमंत्रित किया गया था, नाईट वह व्यक्ति थे जिन्होंने पहले शांति निकेतन के करीब श्रीनिकेतन के निर्माण में
रवीन्द्रनाथ टैगोर की सहायता थी। इसके अलावा उन दिनों रूसी नाटककार एंटन चेखव के भतीजे, मिशेल चेखव, जर्मन आधुनिक नर्तकी-कोरियोग्राफर, कर्ट जोस और अन्य जर्मन रुडोल्फ लाबान भी वहां मौजूद थे जिन्होंने डांस नोटेशन का आविष्कार किया था, इस अनुभव ने उनके भावात्मक नृत्य में और अधिक उत्साह भर दिया.
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1938 में उन्होंने भारत को अपना आधार बनाया और
उत्तराखंड हिमालय के
अल्मोड़ा से 3 किमी दूर सिमतोला में 'उदय शंकर इंडिया कल्चरल सेंटर' की स्थापना की, उन्होंने
कथकली के लिए शंकरण नम्बूदरी को,
भरतनाट्यम के लिए कंडप्पा पिल्लई को, मणिपुरी के लिए अम्बी सिंह को और संगीत के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खान को आमंत्रित किया। शीघ्र ही उनके पास
गुरुदत्त, शांति बर्धन, सिमकी, अमला, सत्यवती, नरेंद्र शर्मा, रुमा गुहा ठाकुरता, प्रभात गांगुली, ज़ोहरा सहगल, उज़रा, लक्ष्मी शंकर, शांता गांधी सहित कलाकारों और नर्तकों का जमावड़ा लग गया; उनके अपने भाई राजेन्द्र, देबेन्द्र और रवि भी छात्रों के रूप में उनके साथ शामिल हो गए। हालांकि यह केंद्र चार साल अस्तित्व में रहने के बाद धन की कमी के कारण 1942 में बंद हो गया। अपने छात्रों के निराश हो जाने पर उन्होंने अपनी ऊर्जा को संचित किया और दक्षिण की ओर रुख किया जहां उन्होंने 1948 में अपनी एकमात्र फिल्म
कल्पना (इमेजिनेशन) बनायी जी उनके नृत्य पर आधारित थी जिसमें उन्होंने और उनकी पत्नी अमला शंकर ने नृत्य किया था, इस फिल्म का निर्माण और फिल्मांकन मद्रास के जेमिनी स्टूडियो में किया गया था।
उदय शंकर 1960 में
कोलकाता के बालीगंज में बस गए जहां बाद में 1965 में "उदय शंकर नृत्य केंद्र" खोला गया था। 1962 में भारतीय नृत्य में उनके जीवन भर के योगदान के लिए उन्हें
संगीत नाटक अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया।
1977 में उनकी मृत्यु के बाद अमला शंकर ने कोलकाता स्कूल का जिम्मा संभाल लिया जो लोक और शास्त्रीय नृत्य, नवीनीकरण, वेशभूषा डिजाइन आदि में निरंतर प्रशिक्षण प्रदान करती आ रही है। 1991 में उन्हें
पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उनके बेटे आनंद शंकर की पत्नी तनुश्री शंकर भी 'तनुश्री शंकर डांस कंपनी' के अधीन भारतीय आधुनिक नृत्य की अपनी शैली का अध्यापन और प्रदर्शन करती आ रही हैं। वर्षों के बाद अल्मोड़ा में उनके स्कूल को भंग कर दिया गया, लेकिन उनके शिष्य और सहयोगी नृत्य की उनकी आविष्कारी शैली और उनके अपने कार्यों के माध्यम से उनके सौंदर्य का प्रचार-प्रसार करने में जुटे रहे. कई लोगों ने अपनी स्वयं की कंपनियां बना ली, इस प्रकार उनकी रचनाओं के व्यापक भण्डार की चिरस्थायी विरासत और नर्तकों पर उनकी पीढ़ी के प्रभाव को संजो कर रखा गया। इनमें से एक शांति बर्धन थे जिन्होंने कठपुतलियों की तरह प्रदर्शन करने वाले मनुष्यों का इस्तेमाल कर
रामायण बैले प्रस्तुतियों की रचना की और पक्षियों एवं पशुओं की गतिविधियों की रचना करते हुए
पंचतंत्र की कथाओं को भी नृत्यों में पेश किया। उनके स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने वाले
गुरुदत्त भारत के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में से एक बने. एक छात्रा लक्ष्मी शंकर जिन्होंने आगे चलकर अपनी धारा बदल दी और एक विख्यात शास्त्रीय गायक बनीं, बाद में उन्होंने उदय शंकर के छोटे भाई राजेन्द्र शंकर से शादी की. ज़ोहरा सहगल ने भारत और ब्रिटेन दोनों जगह रंगमंच, टेलीविजन और सिनेमा में अपना करियर बनाया. सत्यवती ने बाद में 1956 में लंदन के द रॉयल फेस्टिवल हॉल और एडिनबर्ग समारोह में राम गोपाल के साथ नृत्य किया। चार दशक से अधिक लंबे अपने शिक्षण करियर के दौरान उन्होंने मुंबई में हजारों छोटी लड़कियों को इस शहर के विभिन्न कॉन्वेंट स्कूलों में अपनी कक्षाओं के माध्यम से भारतीय नृत्य का प्रशिक्षण दिया.
दिसंबर 1983 में उनके छोटे भाई
सितार वादक
रवि शंकर ने 1923 में उनके पेशेवर जीवन की शुरुआत की 60वीं वर्षगांठ की याद में नई दिल्ली में एक चार दिवसीय महोत्सव
उदय-उत्सव फेस्टिवल का आयोजन किया, जिसमें उनके शिष्यों के प्रदर्शनों, फिल्मों, एक प्रदर्शनी और स्वयं रवि शंकर द्वारा रचित एवं वाद्य यंत्रों से सुसज्जित आर्केस्ट्रा संगीत का प्रदर्शन किया गया। उनकी जन्म शताब्दी समारोह का शुभारंभ 26 अप्रैल 2001 को औपचारिक रूप से पेरिस में यूनेस्को के मुख्यालय में हुआ जहां दुनिया भर के नर्तक, नृत्य-निर्देशक और विद्वान अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए थे।
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