Popular Posts
Sunday, December 15, 2019
Wednesday, November 13, 2019
उदय शंकर
उदय शंकर
उदय शंकर (8 दिसम्बर 1900 - 26 सितंबर 1977) (बांग्ला: উদয় শংকর) भारत में आधुनिक नृत्य के जन्मदाता और एक विश्व प्रसिद्ध भारतीय नर्तक एवं नृत्य-निर्देशक (कोरियोग्राफर) थे जिन्हें अधिकतर भारतीय शास्त्रीय, लोक और जनजातीय नृत्य के तत्वों में पिरोये गए पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय नृत्य में पश्चिमी रंगमंचीय तकनीकों को अपनाने के लिए जाना जाता है; इस प्रकार उन्होंने आधुनिक भारतीय नृत्य की नींव रखी और बाद में 1920 और 1930 के दशक में उसे भारत, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में लोकप्रिय बनाया और भारतीय नृत्य को दुनिया के मानचित्र पर प्रभावशाली ढंग से स्थापित किया।.
1962 में उन्हें भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी 'संगीत नाटक अकादमी' द्वारा इसके सर्वोच्च पुरस्कार, 'जीवनपर्यंत उपलब्धि के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से सम्मानित किया गया था; और 1971 में भारत सरकार ने उन्हें अपने दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। विश्वभारती द्वारा १९७५ में उन्हें "देशी कोत्तम" सम्मान प्रदान किया गया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
राजस्थान के उदयपुर में पैदा हुए उदय शंकर चौधरी मूलतः नरैल (वर्तमान बांग्लादेश) के एक बंगाली परिवार से संबंधित थे। उसके पिता एक प्रख्यात वकील श्याम शंकर चौधरी अपने सबसे बड़े पुत्र के जन्म से समय राजस्थान में झालावाड़ के महाराजा के यहां कार्यरत थे जबकि उनकी मां हेमांगिनी देवी एक बंगाली जमींदारी परिवार की वंशज थीं। उनके पिता को नवाबों द्वारा "हरचौधरी" की उपाधि प्रदान की गयी थी लेकिन वे अपने उपनाम से "हर" को हटाकर सिर्फ 'चौधरी' का प्रयोग करना पसंद करते थे। उनके छोटे भाई राजेन्द्र शंकर, देबेन्द्र शंकर, भूपेन्द्र शंकर और 1926 में पैदा हुए रवि शंकर थे जिनमें से भूपेंद्र की मौत 1926 में कम उम्र में ही हो गयी थी।
उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे जिन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी और बाद में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था जहां वे डॉक्टर ऑफ फिलोसफी बने थे। क्योंकि उनके पिता को अपने काम के संदर्भ में बहुत अधिक घूमना पड़ता था, इसलिए उनके परिवार ने ज्यादातर समय उदय के मामा के घर नसरतपुर में उनकी माँ और भाइयों के साथ बिताया था। उदय की पढ़ाई भी विभिन्न स्थानों पर हुई जिनमें नसरतपुर, गाज़ीपुर, वाराणसी और झालावाड़ शामिल हैं। अपने गाज़ीपुर के स्कूल में उन्होंने अपने चित्रकला एवं शिल्पकला के शिक्षक अंबिका चरण मुखोपाध्याय से संगीत और फोटोग्राफी की शिक्षा प्राप्त की
1918 में अठारह वर्ष की आयु में उन्हें जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट और उसके बाद गंधर्व महाविद्यालय में प्रशिक्षण के लिए मुंबई भेजा गया था। तब तक श्याम शंकर ने झालावाड़ में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और लंदन चले गए थे, यहाँ उन्होंने अंग्रेज महिला से शादी कर ली और एक शौकिया संयोजक (इम्प्रेसारियो) बनने से पहले कानून की प्रैक्टिस करने लगे, इस दौरान उन्होंने ब्रिटेन में भारतीय संगीत और नृत्य की शुरुआत की. बाद में उदय अपने पिता के साथ शामिल हो गए और 23 अगस्त 1920 को सर विलियम रोथेंस्टीन के अधीन चित्रकारी का अध्ययन करने के लिए लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट में दाखिला ले लिया। यहां उन्होंने अपने पिता द्वारा लंदन में आयोजित करवाए गए कुछ चैरिटी कार्यक्रमों में नृत्य का प्रदर्शन किया, ऐसे ही एक अवसर पर प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा भी मौजूद थीं, यह उनके करियर में दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाली घटना बनी.[11]
करियर
उदय शंकर ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के किसी भी स्वरूप में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, उनकी प्रस्तुतियां रचनात्मक थीं। हालांकि कम उम्र से ही वे भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियों के संपर्क में आते रहे थे, यूरोप में रहने के दौरान वे बैले से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दोनों शैलियों के तत्वों को मिलाकर नृत्य की एक नयी शैली की रचना करने का फैसला कर लिया जिसे हाई-डांस (hi-dance) कहा गया। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के स्वरूपों और उनके प्रतीकों को नृत्य रूप प्रदान किया; इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश संग्रहालय में राजपूत चित्रकला और मुगल चित्रकला की शैलियों का अध्ययन किया था। इसके अलावा ब्रिटेन में अपने प्रवास के दौरान वे नृत्य प्रदर्शन करने वाले कई कलाकारों के संपर्क में आये, बाद में वे फ्रांसीसी सरकार के वजीफे 'प्रिक्स डी रोम' पर कला में उच्च-स्तरीय अध्ययन के लिए रोम चले गए।
शीघ्र ही इस तरह के कलाकारों के साथ उनका संपर्क बढ़ गया, साथ ही भारतीय नृत्य करने को एक समकालीन रूप देने का उनका विचार भी मजबूत हुआ। उनकी कामयाबी के रास्ते में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा से एक मुलाक़ात के रूप में आया। वे भारत आधारित विषयों पर सहयोग के लिए कलाकारों की खोज में थीं। इसी के कारण हिन्दू विषयों पर आधारित बैले की रचना हुई जिसमें अन्ना के साथ एक युगल 'राधा-कृष्णा' और 'हिंदू विवाह' को अन्ना के प्रोडक्शन 'ओरिएंटल इम्प्रेशंस' में शामिल किया गया था। इस बैले का प्रदर्शन लंदन के कोवेंट गार्डन में स्थित रॉयल ओपेरा हाउस में किया गया था। बाद में भी वे बैले की रचना और कोरियोग्राफी में जुटे रहे जिनमें से एक अजन्ता गुफाओं के भित्तिचित्रों पर आधारित है, साथ ही उन्होंने अन्ना के साथ संपूर्ण संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रदर्शन किया, इस दौरान उनकी नृत्य शैली को उन दिनों "हाई डांस" के रूप में जाना गया, हालांकि बाद में उन्होंने इसे "क्रिएटिव डांस (रचनात्मक नृत्य)" कहा.
पेरिस में अपने बूते पर काम शुरू करने से पहले उन्होंने अन्ना के साथ डेढ़ वर्ष तक काम किया।
शंकर, एक फ्रेंच पियानोवादक साइमन बार्बियरे जो अब उनके शिष्य और डांस पार्टनर बन गए थे और एक स्विस संगतराशnl:Alice Boners, एलिस बोन्नर जो भारतीय कला के इतिहास का अध्ययन करना चाहते थे, को साथ लेकर 1927 में भारत लौटे. उनका स्वागत स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर ने किया और भारत में प्रदर्शन कला का एक विद्यालय खोलने के लिए उन्हें राजी भी कर लिया।
1931 में पेरिस वापस लौटने पर उन्होंने अपने एक पुराने शिष्य स्विस संगतराश एलिस बोनर के साथ यूरोप की पहली भारतीय नृत्य कंपनी की स्थापना की. वहाँ संगीतकारों विष्णु दास शिराली और तिमिर बारान के साथ मिलकर उन्होंने अपनी नव विकसित नृत्य गतिविधियों को शामिल करने के लिए संगीत के एक नए टेम्पलेट की रचना की. नृत्य प्रदर्शन की उनकी पहली श्रृंखला 3 मार्च 1931 को पेरिस में चैम्प्स-एलिसीज थिएटर में आयोजित की गयी थी जो उनकी बुनियाद बनी क्योंकि उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा किया, साथ ही फ्रांसीसी नर्तकों और कोरियोग्राफरों के साथ अपने संपर्क का विस्तार किया।[15]
जल्द ही उन्होंने संयोजक सोल हुरोक और संयोजक आरोन रिचमोंड की सेलिब्रिटी सीरीज ऑफ बोस्टन के तत्वावधान में 'उदय शंकर एंड हिज हिंदू बैले' शीर्षक से अपनी मंडली के साथ पूरे पश्चिमी जगत - यूरोप और अमेरिका में सात-वर्षों का एक दौरा शुरू किया। उन्होंने अमेरिका में अपना पहला प्रदर्शन अपने डांस पार्टनर, एक फ्रेंच डांसर सिमकी के साथ जनवरी 1933 में न्यूयॉर्क में किया था; उसके बाद वे अपनी मंडली के साथ 84 शहरों के एक दौरे पर निकल गए।
भारतीय नृत्य में पश्चिमी नाट्य तकनीकों के उनके अनुकूलन ने उनकी कला को भारत और पश्चिमी जगत दोनों में बेहद लोकप्रिय बना दिया और उन्हें उचित रूप से पारंपरिक भारतीय मंदिर नृत्यों में पुनर्जागरण के एक युग की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है, जिन्हें आज भी उनकी सख्त व्याख्याओं के लिए जाना जाता है और जो उनकी अपनी जिंदगी में भी पूरी तरह से व्याप्त था जबकि उनके बड़े भाई रवि शंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम में लोकप्रिय बनाने में मदद की.
1936 में उन्हें लियोनार्ड नाईट एल्महर्स्ट द्वारा उनकी मंडली और मुख्य डांसर सिमकी के साथ छः महीने के प्रवास के लिए डार्टिंगटन हॉल, टोटनेस, डोवन आने के लिए आमंत्रित किया गया था, नाईट वह व्यक्ति थे जिन्होंने पहले शांति निकेतन के करीब श्रीनिकेतन के निर्माण में रवीन्द्रनाथ टैगोर की सहायता थी। इसके अलावा उन दिनों रूसी नाटककार एंटन चेखव के भतीजे, मिशेल चेखव, जर्मन आधुनिक नर्तकी-कोरियोग्राफर, कर्ट जोस और अन्य जर्मन रुडोल्फ लाबान भी वहां मौजूद थे जिन्होंने डांस नोटेशन का आविष्कार किया था, इस अनुभव ने उनके भावात्मक नृत्य में और अधिक उत्साह भर दिया.[18]
1938 में उन्होंने भारत को अपना आधार बनाया और उत्तराखंड हिमालय के अल्मोड़ा से 3 किमी दूर सिमतोला में 'उदय शंकर इंडिया कल्चरल सेंटर' की स्थापना की, उन्होंने कथकली के लिए शंकरण नम्बूदरी को, भरतनाट्यम के लिए कंडप्पा पिल्लई को, मणिपुरी के लिए अम्बी सिंह को और संगीत के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खान को आमंत्रित किया। शीघ्र ही उनके पास गुरुदत्त, शांति बर्धन, सिमकी, अमला, सत्यवती, नरेंद्र शर्मा, रुमा गुहा ठाकुरता, प्रभात गांगुली, ज़ोहरा सहगल, उज़रा, लक्ष्मी शंकर, शांता गांधी सहित कलाकारों और नर्तकों का जमावड़ा लग गया; उनके अपने भाई राजेन्द्र, देबेन्द्र और रवि भी छात्रों के रूप में उनके साथ शामिल हो गए। हालांकि यह केंद्र चार साल अस्तित्व में रहने के बाद धन की कमी के कारण 1942 में बंद हो गया। अपने छात्रों के निराश हो जाने पर उन्होंने अपनी ऊर्जा को संचित किया और दक्षिण की ओर रुख किया जहां उन्होंने 1948 में अपनी एकमात्र फिल्म कल्पना (इमेजिनेशन) बनायी जी उनके नृत्य पर आधारित थी जिसमें उन्होंने और उनकी पत्नी अमला शंकर ने नृत्य किया था, इस फिल्म का निर्माण और फिल्मांकन मद्रास के जेमिनी स्टूडियो में किया गया था।
उदय शंकर 1960 में कोलकाता के बालीगंज में बस गए जहां बाद में 1965 में "उदय शंकर नृत्य केंद्र" खोला गया था। 1962 में भारतीय नृत्य में उनके जीवन भर के योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किया गया।
निजी जिंदगी
उन्होंने अमला शंकर से शादी की थी और 1942 में उनके यहां एक पुत्र आनंद शंकर और 1955 में एक पुत्री ममता शंकर पैदा हुई थी। जबकि आनंद शंकर एक संगीतकार और संगीत कम्पोजर थे जिन्होंने अपने चाचा रवि शंकर की बजाय डॉ॰ लालमणि मिश्रा से प्रशिक्षण प्राप्त किया था और उस समय अपने फ्यूजन संगीत के लिए जाने गए थे जिसमें पश्चिमी और भारतीय संगीत शैलियों दोनों को शामिल किया गया था। ममता शंकर अपने माता-पिता की तरह एक नर्तकी थी जो एक प्रख्यात अभिनेत्री बन गई जिन्होंने सत्यजीत रे और मृणाल सेन की फिल्मों में काम किया, वे कोलकाता में 'उदयन डांस कंपनी' भी चलाती हैं और दुनिया भर में व्यापक रूप से यात्राएं करती हैं।
विरासत
1977 में उनकी मृत्यु के बाद अमला शंकर ने कोलकाता स्कूल का जिम्मा संभाल लिया जो लोक और शास्त्रीय नृत्य, नवीनीकरण, वेशभूषा डिजाइन आदि में निरंतर प्रशिक्षण प्रदान करती आ रही है। 1991 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उनके बेटे आनंद शंकर की पत्नी तनुश्री शंकर भी 'तनुश्री शंकर डांस कंपनी' के अधीन भारतीय आधुनिक नृत्य की अपनी शैली का अध्यापन और प्रदर्शन करती आ रही हैं। वर्षों के बाद अल्मोड़ा में उनके स्कूल को भंग कर दिया गया, लेकिन उनके शिष्य और सहयोगी नृत्य की उनकी आविष्कारी शैली और उनके अपने कार्यों के माध्यम से उनके सौंदर्य का प्रचार-प्रसार करने में जुटे रहे. कई लोगों ने अपनी स्वयं की कंपनियां बना ली, इस प्रकार उनकी रचनाओं के व्यापक भण्डार की चिरस्थायी विरासत और नर्तकों पर उनकी पीढ़ी के प्रभाव को संजो कर रखा गया। इनमें से एक शांति बर्धन थे जिन्होंने कठपुतलियों की तरह प्रदर्शन करने वाले मनुष्यों का इस्तेमाल कर रामायण बैले प्रस्तुतियों की रचना की और पक्षियों एवं पशुओं की गतिविधियों की रचना करते हुए पंचतंत्र की कथाओं को भी नृत्यों में पेश किया। उनके स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने वाले गुरुदत्त भारत के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में से एक बने. एक छात्रा लक्ष्मी शंकर जिन्होंने आगे चलकर अपनी धारा बदल दी और एक विख्यात शास्त्रीय गायक बनीं, बाद में उन्होंने उदय शंकर के छोटे भाई राजेन्द्र शंकर से शादी की. ज़ोहरा सहगल ने भारत और ब्रिटेन दोनों जगह रंगमंच, टेलीविजन और सिनेमा में अपना करियर बनाया. सत्यवती ने बाद में 1956 में लंदन के द रॉयल फेस्टिवल हॉल और एडिनबर्ग समारोह में राम गोपाल के साथ नृत्य किया। चार दशक से अधिक लंबे अपने शिक्षण करियर के दौरान उन्होंने मुंबई में हजारों छोटी लड़कियों को इस शहर के विभिन्न कॉन्वेंट स्कूलों में अपनी कक्षाओं के माध्यम से भारतीय नृत्य का प्रशिक्षण दिया.
दिसंबर 1983 में उनके छोटे भाई सितार वादक रवि शंकर ने 1923 में उनके पेशेवर जीवन की शुरुआत की 60वीं वर्षगांठ की याद में नई दिल्ली में एक चार दिवसीय महोत्सव उदय-उत्सव फेस्टिवल का आयोजन किया, जिसमें उनके शिष्यों के प्रदर्शनों, फिल्मों, एक प्रदर्शनी और स्वयं रवि शंकर द्वारा रचित एवं वाद्य यंत्रों से सुसज्जित आर्केस्ट्रा संगीत का प्रदर्शन किया गया। उनकी जन्म शताब्दी समारोह का शुभारंभ 26 अप्रैल 2001 को औपचारिक रूप से पेरिस में यूनेस्को के मुख्यालय में हुआ जहां दुनिया भर के नर्तक, नृत्य-निर्देशक और विद्वान अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए थे।[
पुरस्कार
- 1960: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार - 'क्रिएटिव डांस (रचनात्मक नृत्य)'
- 1962: संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
- 1971: पद्म विभूषण
- 1975: देसीकोकोट्टम, विश्व भारती विश्वविद्यालय
रामवृक्ष बेनीपुरी
परिचय
इनका जन्म २३ दिसंबर, १८९९ को उनके पैतृक गांव मुजफफरपुर जिले (बिहार) के बेनीपुर गांव के एक भूमिहर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसी के आधार पर उन्होंने अपना उपनाम 'बेनीपुरी' रखा था। उनकी प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में हुई थी। मैट्रिक पास करने के बाद वे असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये। उनकी भाषा-वाणी प्रभावशाली थी। उनका व्यक्तित्त्व आकर्षक एवं शौर्य की आभा से दीप्त था। वे एक सफल संपादक के रूप में भी याद किये जाते हैं। वे राजनीतिक पुरूष न थे, पक्के देशभक्त थे। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आठ वर्ष जेल में बिताये थे। ये हिन्दी साहित्य के पत्रकार भी रहे और इन्होंने कई समाचारपत्रों जैसे युवक (१९२९) भी निकाले। इसके अलावा कई राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता संग्राम संबंधी कार्यों में संलग्न रहे। ७ सितंबर, १९६८ को वे इस संसार से विदा हो गये।
रचनाएँ
रामवृक्ष बेनीपुरी की आत्मा में राष्ट्रीय भावना लहू के संग लहू के रूप में बहती थी जिसके कारण आजीवन वह चैन की सांस न ले सके। उनके फुटकर लेखों से और उनके साथियों के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारंभ काल से ही क्रान्तिकारी रचनाओं के कारण बार-बार उन्हें कारावास भोगना पड़ता। सन् १९४२ में अगस्त क्रांति आंदोलन के कारण उन्हें हजारीबाग जेल में रहना पड़ा। जेलवास में भी वह शान्त नहीं बैठे सकते थे। वे वहां जेल में भी आग भड़काने वाली रचनायें लिखते। जब भी वे जेल से बाहर आते उनके हाथ में दो-चार ग्रन्थों की पाण्डुलिपियां अवश्य होतीं, जो आज साहित्य की अमूल्य निधि बन गईं। उनकी अधिकतर रचनाएं जेलवास की कृतियां हैं।
सन् १९३० के कारावास काल के अनुभव के आधार पर पतितों के देश में उपन्यास का सृजन हुआ। इसी प्रकार सन् १९४६ में अंग्रेज भारत छोड़ने पर विवश हुए तो सभी राजनैतिक एवं देशभक्त नेताओं को रिहा कर दिया गया। उनमें रामवृक्ष बेनीपुरी जी भी थे। कारागार से मुक्ति की पावन पवन के साथ साहित्य की उत्कृष्ट रचना माटी की मूरतें रेखाचित्र और आम्रपाली उपन्यास की पाण्डुलिपियां उनके उत्कृष्ट विचारों को अपने अन्दर समा चुकी थीं। उनकी अनेक रचनायें जो यश कलगी के समान हैं उनमें जय प्रकाश, नेत्रदान, सीता की मां, 'विजेता', 'मील के पत्थर', 'गेहूं और गुलाब' शामिल है।'शेक्सपीयर के गांव में' और 'नींव की ईंट'। इन लेखों में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने देश प्रेम, साहित्य प्रेम, त्याग की महत्ता, साहित्यकारों के प्रति सम्मान भाव दर्शाया है वह अविस्मरणीय है।
उनकी रचनाओं का विस्तृत विवरण इस प्रकार है-
नाटक
सम्पादन एवं आलोचन
| जीवनीसंस्मरण तथा निबन्ध
ललित गद्य
ग्रन्थावली
|
सम्मान
दिनकर जी ने एक बार बेनीपुरी जी के विषय में कहा था, "स्वर्गीय पंडित रामवृक्ष बेनीपुरी केवल साहित्यकार नहीं थे, उनके भीतर केवल वही आग नहीं थी जो कलम से निकल कर साहित्य बन जाती है। वे उस आग के भी धनी थे जो राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है, जो परंपराओं को तोड़ती है और मूल्यों पर प्रहार करती है। जो चिंतन को निर्भीक एवं कर्म को तेज बनाती है। बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रान्तिकारी और निर्भीक योद्धा सभी एक साथ निवास करते थे।" १९९९ में भारतीय डाक सेवा द्वारा बेनीपुरी जी के सम्मान में भारत का भाषायी सौहार्द मनाने हेतु भारतीय संघ के हिन्दी को राष्ट्र-भाषा अपनाने की अर्ध-शती वर्ष में डाक-टिकटों का एक सेट जारी किया। उनके सम्मान में बिहार सरकार द्वारा वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार दिया जाता है।
Monday, November 11, 2019
रामधारी सिंह 'दिनकर
रामधारी सिंह 'दिनकर
रामधारी सिंह 'दिनकर' (23 सितम्बर 1908- 25 अप्रैल 1965) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।
'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तिय का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।
जीवनी
Ramdhari singh दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से १९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।
उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। उनकी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।
द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य कुरुक्षेत्र को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ काव्यों में ७४वाँ स्थान दिया गया।
प्रमुख कृतियाँ
उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। उर्वशी को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।
ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। उर्वशी स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है।
विस्तृत दिनकर साहित्य सूची नीचे दी गयी है-
काव्य
1. बारदोली-विजय संदेश (1928)
2. प्रणभंग (1929)
3. रेणुका (1935)
4. हुंकार (1938)
5. रसवन्ती (1939)
6.द्वंद्वगीत (1940)
7. कुरूक्षेत्र (1946)
8. धूप-छाँह (1947)
9. सामधेनी (1947)
10. बापू (1947)
11. इतिहास के आँसू (1951)
12. धूप और धुआँ (1951)
13. मिर्च का मजा (1951)
14. रश्मिरथी (1952)
15. दिल्ली (1954)
16. नीम के पत्ते (1954)
17. नील कुसुम (1955)
18. सूरज का ब्याह (1955)
19. चक्रवाल (1956)
20. कवि-श्री (1957)
21. सीपी और शंख (1957)
22. नये सुभाषित (1957)
23. लोकप्रिय कवि दिनकर (1960)
24. उर्वशी (1961)
25. परशुराम की प्रतीक्षा (1963)
26. आत्मा की आँखें (1964)
27. कोयला और कवित्व (1964)
28. मृत्ति-तिलक (1964)
29. दिनकर की सूक्तियाँ (1964)
30. हारे को हरिनाम (1970)
31. संचियता (1973)
32. दिनकर के गीत (1973)
33. रश्मिलोक (1974)
34. उर्वशी तथा अन्य शृंगारिक कविताएँ (1974)
गद्य
35. मिट्टी की ओर 1946
36. चित्तौड़ का साका 1948
37. अर्धनारीश्वर 1952
38. रेती के फूल 1954
39. हमारी सांस्कृतिक एकता 1955
40. भारत की सांस्कृतिक कहानी 1955
41. संस्कृति के चार अध्याय 1956
42. उजली आग 1956
43. देश-विदेश 1957
44. राष्ट्र-भाषा और राष्ट्रीय एकता 1955
45. काव्य की भूमिका 1958
46. पन्त-प्रसाद और मैथिलीशरण 1958
47. वेणुवन 1958
48. धर्म, नैतिकता और विज्ञान 1969
49. वट-पीपल 1961
50. लोकदेव नेहरू 1965
51. शुद्ध कविता की खोज 1966
52. साहित्य-मुखी 1968
53. राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधीजी 1968
54. हे राम! 1968
55. संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ 1970
56. भारतीय एकता 1971
57. मेरी यात्राएँ 1971
58. दिनकर की डायरी 1973
59. चेतना की शिला 1973
60. विवाह की मुसीबतें 1973
61. आधुनिक बोध 1973
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था "दिनकरजी अहिंदीभाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे।" हरिवंश राय बच्चन ने कहा था "दिनकरजी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये।" रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था "दिनकरजी ने देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन को स्वर दिया।" नामवर सिंह ने कहा है "दिनकरजी अपने युग के सचमुच सूर्य थे।" प्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा था कि दिनकरजी की रचनाओं ने उन्हें बहुत प्रेरित किया। प्रसिद्ध रचनाकार काशीनाथ सिंह के अनुसार 'दिनकरजी राष्ट्रवादी और साम्राज्य-विरोधी कवि थे।'
रचनाओं के कुछ अंश
किस भांति उठूँ इतना ऊपर? मस्तक कैसे छू पाउँ मैं? ग्रीवा तक हाथ न जा सकते, उँगलियाँ न छू सकती ललाट वामन की पूजा किस प्रकार, पहुँचे तुम तक मानव विराट?
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो चट्टानों की छाती से दूध निकालो है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो (वीर से)
पद
|
Friday, November 8, 2019
मुख्तार अहमद अंसारी
मुख्तार अहमद अंसारी
डॉ॰ मुख्तार अहमद अंसारी- एक भारतीय राष्ट्रवादी और राजनेता होने के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के पूर्व अध्यक्ष थे। वे जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्थापकों में से एक थे, 1928 से 1936 तक वे इसके कुलाधिपति भी रहे।
प्रारंभिक जीवन और चिकित्सीय करियर
मुख्तार अहमद अंसारी का जन्म 25 दिसम्बर 1880 को नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविन्सेस (अब उत्तर प्रदेश का एक भाग) में यूसुफपुर-मोहम्मदाबाद शहर में हुआ था।
उन्होंने विक्टोरिया हाई स्कूल में शिक्षा ग्रहण की और बाद में वे और उनका परिवार हैदराबाद चले गए। अंसारी ने मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की और छात्रवृत्ति पर अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गए। उन्होंने एम.डी. और एम.एस. की उपाधियाँ हासिल की। वे एक उच्च श्रेणी के छात्र थे और उन्होंने लंदन में लॉक हॉस्पिटल और चैरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में कार्य किया। वे सर्जरी में भारत के अग्रणी थे और आज चैरिंग क्रॉस हॉस्पिटल में उनके कार्य के सम्मान में एक अंसारी वार्ड मौजूद है
राष्ट्रवादी गतिविधियां]
डॉ॰ अंसारी इंग्लैंड में अपने प्रवास के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए. वे वापस दिल्ली आये और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों में शामिल हो गए। 1916 की लखनऊ संधि की बातचीत में उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1918 से 1920 के बीच लीग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे खिलाफत आंदोलन के एक मुखर समर्थक थे और उन्होंने इस्लाम के खलीफा, तुर्की के सुलतान को हटाने के मुस्तफा कमाल के निर्णय के खिलाफ मुद्दे पर सरकारी खिलाफत निकाय, लीग और कांग्रेस पार्टी को एक साथ लाने और ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा तुर्की की आजादी की मान्यता का विरोध करने के लिए काम किया।
डॉ॰ अंसारी ने एआईसीसी के महासचिव के रूप में कई बार काम किया, साथ ही 1927 के सत्र के दौरान वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। 1920 के दशक में लीग के भीतर अंदरूनी लड़ाई और राजनीतिक विभाजन और बाद में मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम अलगाववाद के उभार के परिणाम स्वरूप डॉ॰ अंसारी महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी के करीब आ गए।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
डॉ॰ अंसारी (जामिया मिलिया इस्लामिया की फाउंडेशन समिति) के संस्थापकों में से एक थे और 1927 में इसके प्राथमिक संस्थापक, डॉ॰ हाकिम अजमल खान की मौत के कुछ ही समय बाद उन्होंने दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में भी काम किया।[1]
निजी जीवन और धारणाएं
डॉ॰ अंसारी की पत्नी अत्यंत धार्मिक महिला थीं जिन्होंने उनके साथ दिल्ली की मुस्लिम महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया था।[कृपया उद्धरण जोड़ें] अंसारी परिवार एक महलनुमा घर में रहता था जिसे उर्दू में दारुस सलाम या एडोबे ऑफ पीस कहा जाता था। महात्मा गांधी जब भी दिल्ली आते थे, अंसारी परिवार अक्सर उनका स्वागत करता था और यह घर कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों का एक नियमित आधार था। हालांकि उन्होंने मेडिसिन का अभ्यास करना कभी बंद नहीं किया और अक्सर भारत के राजनेताओं और भारतीय राजसी व्यवस्था की सहायता के लिए आगे आये।
डॉ॰ अंसारी भारतीय मुस्लिम राष्ट्रवादियों की एक नयी पीढ़ी में से एक थे जिसमें मौलाना आजाद, मुहम्मद अली जिन्ना और अन्य शामिल थे। वे आम भारतीय मुसलमानों के मुद्दों के बारे में बहुत भावुक थे लेकिन जिन्ना के विपरीत, अलग मतदाताओं के सख्ती से खिलाफ थे और उन्होंने जिन्ना के इस दृष्टिकोण का विरोध किया था कि केवल मुस्लिम लीग ही भारत के मुस्लिम समुदायों की प्रतिनिधि हो सकती है।
डॉ॰ अंसारी महात्मा गांधी के बहुत करीब थे और उनके अहिंसा तथा अहिंसक नागरिक प्रतिरोध के प्रमुख उपदेशों के साथ गांधीवाद के पक्षधर थे। महात्मा के साथ उनकी एक अंतरंग दोस्ती रही थी।
डॉ॰ अंसारी का निधन 1936 में मसूरी से दिल्ली की यात्रा के मार्ग में एक ट्रेन में दिल का दौरा पड़ने से हो गया था, उन्हें दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में दफनाया गया है।
Subscribe to:
Comments (Atom)




