किसान जागरण के योद्दा
सन्यासी- स्वामी सहजानंद सरस्वती
यह सुखद संयोग है कि पूरा
देश वर्ष 2017 को कई प्रकार की क्रांतियों की विरासत वर्ष के रूप में याद कर रहा
है. गाँधी जी के चंपारण सत्याग्रह और रुसी क्रांति के सौ बरस पूरे हुए है. सभी
विचारधाराओं के क्रांतिधर्मी लोग अपने-अपने इतिहास की गहन गुफा में जाकर कुछ –न
कुछ ढूंढ कर लाये है ! जिन्हें अभी तक कुछ हासिल नहीं हो पाया है वे अभी इतिहास की
शव-साधना (पोस्टमार्टम) करने में जुटे हुए है. इस आयोजनधर्मी शोर- शराबे के बीच आज
एक ऐसे योद्दा सन्यासी का 128 वा जन्म दिवस है जिसकी एक ही विचारधारा थी –वन्दे
अन्नदातारम ! अन्न का सम्बन्ध भूख से है. भूख रोटी से मिटती है और रोटी की
आवश्यकता किसी भी सिद्धांत अथवा वाद से परे होती है. जन कवि बाबा नागार्जुन के
शब्दों में “ नहीं दक्षिण नहीं वाम जनता को रोटी से काम” इसलिए इस सन्यासी ने अन्न
उपजाने वाले किसानों को भगवान् से ऊपर का दर्जा दिया.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में महाशिवरात्रि 1889 ई. को संगठित किसान
आन्दोलन के जनक स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर
जिले के एक छोटे से गाँव देवा में बालक नौरंग राय के रूप में हुआ था. गाजीपुर के
जर्मन मिशन स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वर्ष 1917 में नौरंग
राय सन्यास की राह पर चल पड़े. ईश्वर की खोज के क्रम में देशाटन के साथ-साथ वेदांत,
मीमांसा और न्याय शास्त्र के गहन अध्येता बन गए. देश की तत्कालीन परिस्थितियां
विकट थी. एक तरफ ब्रिटिश हूकुमत और दूसरी तरफ उस हूकुमत के वाहक जमींदार थे. इस
दुविधाग्रस्त हिंदुस्तान में किसान दो पाटों के बीच में पिस रहा था. वर्ष 1919 ई.
में बालगंगाधर तिलक जैसे प्रखर राष्ट्रवादी की मृत्यु से उपजी देशव्यापी संवेदना
की वजह से स्वामी सहजानंद राजनीति की तरफ अग्रसर हुए. हमें यहाँ इस बात का ध्यान
रखना चाहिए की तब राजनीति का मतलब चुनाव लड़ना अथवा येन-केन-प्रकारेन सत्ता में आना
नहीं था बल्कि राजनीति का मतलब होता था – राष्ट्र निर्माण की कला और विज्ञान. तिलक
के बाद राष्ट्र निर्माण की इस कला के सूत्रधार थे महात्मा गाँधी. राजनीति में
सक्रीय होने के उपरांत स्वामी सहजानंद की कर्मभूमि बिहार बनी और केंद्र बिहटा
.1927 ई. में पश्चिमी किसान सभा की स्थापना पटना में हुईं जिसकी सभी नीतियाँ वहीँ
थी जो तत्कालीन कांग्रेस निर्धारित करती थी . जिसका मूल उदेश्य था
किसानों-जमींदारों के बीच एक समझौता जिसे राजनितिक भाषा में सुधारवादी रवैया कहा
जाता है. लेकिन 1929 में बिहार के प्रसिद सोनपुर मेले में बिहार प्रांतीय किसान
सभा का गठन हुआ जिसके अध्यक्ष स्वामी जी थे के रचनात्मक और संगठनात्मक कार्यक्रमों
से किसान आन्दोलन जैसे-जैसे तेज़ होता गया किसान सभा और कांग्रेस की दूरी बढ़ती गयी.
वर्ष 1934
में बिहार में आये भयंकर भूकंप के दौरान जमींदारों ( जो कांग्रेस के सदस्य )
द्वारा किसानों के शोषण ने स्वामीजी की 14 वर्षों की अनन्य गाँधी भक्ति को हमेशा
के दफना दिया. अब वे धीरे- धीरे उग्र क्रांति की तरफ अग्रसर होते गए और ‘कैसे लोगे
मालगुजारी लट्ठ हमारा जिंदाबाद ! का नारा किसान आन्दोलन को एक धार प्रदान करने लगा
था. इसका कतई मतलब हिंसा नहीं था जो आजाद भारत में अति क्रांतिकारियों ने किसानवाद
की आड़ में किया. बल्कि एक किसान जागरण का माध्यम था जो उस समय कांग्रेस की किसानों
से समझौतावादी नीतियों का एक विकल्प मात्र
था.
स्वामी सहजानंद सरस्वती के किसान आन्दोलन का
एकमात्र लक्ष्य था किसान –मजदूर राज्य की स्थापना – ‘जो अन्न-वस्त्र उपजायेगा
कानून वहीँ बनाएगा , भारत वर्ष उसी का है अब शासन वही चलाएगा.’ इस किसान-मजदूर
राज्य के सपनों के सहयोगी थे सुभाष चन्द्र बोस, महापंडित राहुल संकृत्यायन ,
बेनीपुरी, यदुनंदन शर्मा, यामुनानंदन कार्यी, बसावन सिंह, जेपी और लोहिया भी. परन्तु,
इतिहास का अंतर्विरोध हर समय में मौजूद रहता है. कुछ लोग कुछ दूर तक साथ चले तो
कुछ ने कांग्रेस की तरफ रूख कर लिया.
स्वामीजी हमेशा किसानों की तरफ ही रूख किये रहे . विचारों के क्रमिक विकास
और संघर्ष के केंद्र में किसानों को देखते हुए वें वामपंथ की तरफ भी लौटे, उनकी
एकता के हिमायती भी बने लेकिन अंतिम समय तक टिक नहीं पाए. कारण की वे देशी
मार्क्सवाद के हिमायती थे. वे सक्रीय वेदान्तवाद की जमीन पर मार्क्सवाद का महल
बनाने की पहल करने वाले देश के पहले और अंतिम योद्दा सन्यासी थे. उनकी किसान
आन्दोलन के अनुभव से लिखी कई पुस्तके आज भी भारतीय किसानों की दशा और दिशा को
बदलने के लिए उपयुक्त है. परन्तु, अब पूरे देश में न तो कोइ किसान आन्दोलन है और न
ही उन पुस्तकों की जरूरत ही किसी को महसूस होती है.
26 जून
1950 को किसानों के लिए संघर्षरत स्वामीजी इस संसार से विदा हो गए. उनके जाने के
बाद न तो वामपंथी ही उन्हें पूरी तरह से अपना पाए और न ही दक्षिण पंथी. क्यों कि
उनका एक ही पंथ था –किसान पंथ. वामपंथ के लिए उनका वेदांत आड़े आ जाता है और
दक्षिणपंथ के लिए उनका देशी मार्क्सवाद. लेकिन आज भी स्वामीजी उनके लिए उतने ही
प्रासंगिक है जिसको वाम और दक्षिण से ज्यादा रोटी की जरूरत है.
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